Wednesday, January 28, 2009

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

-हरिवंशराय बच्चन

9 comments:

  1. Is rachnase ru-b-ru karaya...shukkriya! shukriya!

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  2. aap apne anya blog par article kab tak likhna prarambh karengi tatha uska vishay kya hoga , kyonki main kai baar visit kar bairang wapas laut gaya hoon

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  3. waah deepti di yahan bhi..
    most welcome!!

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  4. हिंदी चिटठा जगत में नवल स्पर्शों के लिए आपको साधुवाद ... वास्तव में बच्चन साहब की इस ह्रदय स्पर्शी कविता को पढ़कर अच्छा लगा

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