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महाकवि कालिदास के मेघदूत से साहित्यानुरागी संसार भलिभांति परिचित है, उसे पढ़ कर जो भावनाएँ ह्रदय में जाग्रत होती हैं, उन्हें ही मैंने निम्नलिखित कविता में पद्यबध्द किया है भक्त गंगा की धारा में खड़ा होता है और उसीके जल से अपनी अंजलि भरकर गंगा को समर्पित कर देता है इस अंजलि में उसका क्या रहता है, सिवा उसकी श्रध्दा के? मैंने भी महाकवि की मंदाक्रांता की मंद गति से प्रवाहित होने वाली इस कविता की मंदाकिनी के बीच खड़े हो कर, इसी में कुछ अंजलि उठाकर इसीको अर्पित किया है इसमें भी मेरे अपनेपन का भाग केवल मेरी श्रध्दा ही है -
- हरिवंशराय बच्चन
"मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता!
हो धरणि चाहे शरद कीचाँदनी में स्नान करती,
वायु ऋतु हेमंत की चाहेगगन में हो विचरती,
हो शिशिर चाहे गिरातापीत-जर्जर पत्र तरू के,
कोकिला चाहे वनों में,हो वसंती राग भरती,
ग्रीष्म का मार्तण्ड चाहे,हो तपाता भूमि-तल को,
दिन प्रथम आषाढ़ का में'मेघ-चर' द्वारा बुलाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
भूल जाता अस्थि-मज्जा-मांसयुक्त शरीर हूँ मैं,
भासता बस-धूम्र संयुतज्योति-सलिल-समीर हूँ मैं,
उठ रहा हूँ उच्च भवनों के,शिखर से और ऊपर,
देखता संसार नीचेइंद्र का वर वीर हूँ मैं,
मंद गति से जा रहा हूँपा पवन अनुकूल अपने
संग है वक-पंक्ति, चातक-दल मधुर स्वर गीत गाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
झोपडी़, ग्रह, भवन भारी,महल औ' प्रासाद सुंदर,
कलश, गुंबद, स्तंभ, उन्नतधरहरे, मीनार द्धढ़तर,
दुर्ग, देवल, पथ सुविस्त्तत,और क्रीडो़द्यान-सारे,
मंत्रिता कवि-लेखनी केस्पर्श से होते अगोचर
और सहसा रामगिरि पर्वतउठाता शीशा अपना,
गोद जिसकी स्निग्ध छाया-वान कानन लहलहाता!
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
देखता इस शैल के हीअंक में बहु पूज्य पुष्कर,
पुण्य जिनको किया थाजनक-तनया ने नहाकर
संग जब श्री राम के वे,थी यहाँ पे वास करती,
देखता अंकित चरण उनकेअनेक अचल-शिला पर,
जान ये पद-चिन्ह वंदितविश्व से होते रहे हैं,
देख इनको शीश में भीभक्ति-श्रध्दा से नवाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
देखता गिरि की शरण मेंएक सर के रम्य तट पर
एक लघु आश्रम घिरा बनतरु-लताओं से सघनतर,
इस जगह कर्तव्य से च्युतयक्ष को पाता अकेला,
निज प्रिया के ध्यान में जोअश्रुमय उच्छवास भर-भर,
क्षीणतन हो, दीनमन होऔर महिमाहीन होकर
वर्ष भर कांता-विरह केशाप के दुर्दिन बिताता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
था दिया अभिशाप अलका-ध्यक्ष ने जिस यक्षवर को,
वर्ष भर का दंड सहकरवह गया कबका स्वघर को,
प्रयेसी को एक क्षण उर सेलगा सब कष्ट भूला
किन्तु शापित यक्षमहाकवि, जन्म-भरा को!
रामगिरि पर चिर विधुर होयुग-युगांतर से पडा़ है,
मिल ना पाएगा प्रलय तकहाय, उसका शाप-त्राता!
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
देख मुझको प्राणप्यारीदामिनी को अंक में भर
ghoomte उन्मुकत नभ मेंवायु के म्रदु-मंद रथ पर,
अट्टहास-विलास से मुख-रित बनाते शून्य को भी
जन सुखी भी क्षुब्ध होतेभाग्य शुभ मेरा सिहाकर;
प्रणयिनी भुज-पाश से जोहै रहा चिरकाल वंचित,
यक्ष मुझको देख कैसेफिर न दुख में डूब जाता?
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
देखता जब यक्ष मुझकोशैल-श्रंगों पर विचरता,
एकटक हो सोचता कुछलोचनों में नीर भरता,
यक्षिणी को निज कुशल-संवाद मुझसे भेजने की
कामना से वह मुझे उठबार-बार प्रणाम करता
कनक विलय-विहीन कर सेफिर कुटज के फूल चुन कर
प्रीती से स्वागत-वचन कहभेंट मेरे प्रति चढा़ता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
पुष्करावर्तक घनों केवंश का मुझको बताकर,
कामरूप सुनाम दे, कहमेघपति का मान्य अनुचर
कंठ कातर यक्ष मुझसेप्रार्थना इस भांति करता-
'जा प्रिया के पास लेसंदेश मेरा,बंधु जलधर!
वास करती वह विरहिणीधनद की अलकापुरी में,
शंभु शिर-शोभित कलाधरज्योतिमय जिसको बनाता'
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
यक्ष पुनः प्रयाण के अनु-रूप कहता मार्ग सुखकर,
फिर बताता किस जगह पर,किस तरह का है नगर, घर,
किस दशा, किस रूप में हैप्रियतमा उसकी सलोनी,
किस तरह सूनी बितातीरात्रि, कैसे दीर्ध वासर,
क्या कहूँगा,क्या करूँगा,मैं पहुँचकर पास उसके;
किन्तु उत्तर के लिए कुछशब्द जिह्वा पर ना आता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
मौन पाकर यक्ष मुझकोसोचकर यह धैर्य धरता,
सत्पुरुष की रीति है यहमौन रहकर कार्य करता,
देखकर उद्यत मुझेप्रस्थान के हित,
कर उठाकरवह मुझे आशीष देता-
'इष्ट देशों में विचरता,हे जलद, श्री व्रिध्दि कर तू
संग वर्षा-दामिनी के,हो न तुझको विरह दुख
जो आज मैं विधिवश उठाता!'
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!
-हरिवंश राय बच्चन
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