बाहर के सब आघातों से, मन का अवसान कहीं बढ़कर
फिर भी मेरे मरते मन ने, तुम तक उड़ने की गति चाही
तुमने अपनी लौ से मेरे सपनो कि चंचलता दाही
इस अनदेखी लौ ने मेरी बुझती पूजा मैं रूप गढा
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा
मैंने चाहा तुम मैं लय हो साँसों के स्वर सा खो जाना
मैं प्रतिक्षण तुममे ही बीतू हो पूर्ण समर्पण का बाना
तुमने ना जाने क्या करके मुझको भंवरो मैं भरमाया
मैंने अगणित मझ्धारो मैं तुमको साकार खडे पाया
भयकारी लहरों मैं भी तो तुम तक आने का चाव चढा
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा
मेरे मन को आधार यही यह सब कुछ तुम ही देते हो
दुःख मैं तन्मयता देकर सुख कि मदिरा हर लेते हो
मैंने सारे अभिमान तजे लेकिन न तुम्हारा गर्व
संचार तुम्हारी करुना का मेरे मन मैं ही नित्य नया
मैंने इतनी दूरी मैं भी तुम तक आने का स्वप्न गढा
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा
आभास तुम्हारी महिमा का कर देता है पूजा मुश्किल
परिपूर्ण तुम्हारी वत्सलता करती मन कि निष्ठा मुश्किल
मैं सब कुछ तुममे ही देखु सब कुछ तुममे ही हो अनुभव
मेरा यह दुर्बल मन किन्तु कहाँ होने देता यह सुख संभव
जितनी तन कि धरती डूबी उतना तन का आकाश बढा
जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा
No comments:
Post a Comment