Wednesday, January 28, 2009

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!
उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

-हरिवंशराय बच्चन

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
-हरिवंशराय बच्चन

जो बीत गई सो बात गयी

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फ़िर कहां मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुरझाईं कितनी वल्लरियां
जो मुरझाईं फ़िर कहां खिली
पर बोलो सूखे फ़ूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फ़ूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं, मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है ,चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

- हरिवंशराय बच्चन

मेघदूत के प्रति

मेघदूत के प्रति / हरिवंशराय बच्चन

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महाकवि कालिदास के मेघदूत से साहित्यानुरागी संसार भलिभांति परिचित है, उसे पढ़ कर जो भावनाएँ ह्रदय में जाग्रत होती हैं, उन्हें ही मैंने निम्नलिखित कविता में पद्यबध्द किया है भक्त गंगा की धारा में खड़ा होता है और उसीके जल से अपनी अंजलि भरकर गंगा को समर्पित कर देता है इस अंजलि में उसका क्या रहता है, सिवा उसकी श्रध्दा के? मैंने भी महाकवि की मंदाक्रांता की मंद गति से प्रवाहित होने वाली इस कविता की मंदाकिनी के बीच खड़े हो कर, इसी में कुछ अंजलि उठाकर इसीको अर्पित किया है इसमें भी मेरे अपनेपन का भाग केवल मेरी श्रध्दा ही है -
- हरिवंशराय बच्चन

"मेघ" जिस जिस काल पढ़ता, मैं स्वयं बन मेघ जाता!
हो धरणि चाहे शरद कीचाँदनी में स्नान करती,

वायु ऋतु हेमंत की चाहेगगन में हो विचरती,
हो शिशिर चाहे गिरातापीत-जर्जर पत्र तरू के,

कोकिला चाहे वनों में,हो वसंती राग भरती,
ग्रीष्म का मार्तण्ड चाहे,हो तपाता भूमि-तल को,

दिन प्रथम आषाढ़ का में'मेघ-चर' द्वारा बुलाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!


भूल जाता अस्थि-मज्जा-मांसयुक्त शरीर हूँ मैं,

भासता बस-धूम्र संयुतज्योति-सलिल-समीर हूँ मैं,

उठ रहा हूँ उच्च भवनों के,शिखर से और ऊपर,
देखता संसार नीचेइंद्र का वर वीर हूँ मैं,

मंद गति से जा रहा हूँपा पवन अनुकूल अपने

संग है वक-पंक्ति, चातक-दल मधुर स्वर गीत गाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

झोपडी़, ग्रह, भवन भारी,महल औ' प्रासाद सुंदर,

कलश, गुंबद, स्तंभ, उन्नतधरहरे, मीनार द्धढ़तर,
दुर्ग, देवल, पथ सुविस्त्तत,और क्रीडो़द्यान-सारे,

मंत्रिता कवि-लेखनी केस्पर्श से होते अगोचर
और सहसा रामगिरि पर्वतउठाता शीशा अपना,

गोद जिसकी स्निग्ध छाया-वान कानन लहलहाता!
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

देखता इस शैल के हीअंक में बहु पूज्य पुष्कर,

पुण्य जिनको किया थाजनक-तनया ने नहाकर
संग जब श्री राम के वे,थी यहाँ पे वास करती,

देखता अंकित चरण उनकेअनेक अचल-शिला पर,
जान ये पद-चिन्ह वंदितविश्व से होते रहे हैं,

देख इनको शीश में भीभक्ति-श्रध्दा से नवाता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

देखता गिरि की शरण मेंएक सर के रम्य तट पर

एक लघु आश्रम घिरा बनतरु-लताओं से सघनतर,

इस जगह कर्तव्य से च्युतयक्ष को पाता अकेला,

निज प्रिया के ध्यान में जोअश्रुमय उच्छवास भर-भर,

क्षीणतन हो, दीनमन होऔर महिमाहीन होकर

वर्ष भर कांता-विरह केशाप के दुर्दिन बिताता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

था दिया अभिशाप अलका-ध्यक्ष ने जिस यक्षवर को,

वर्ष भर का दंड सहकरवह गया कबका स्वघर को,
प्रयेसी को एक क्षण उर सेलगा सब कष्ट भूला
किन्तु शापित यक्षमहाकवि, जन्म-भरा को!
रामगिरि पर चिर विधुर होयुग-युगांतर से पडा़ है,

मिल ना पाएगा प्रलय तकहाय, उसका शाप-त्राता!
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

देख मुझको प्राणप्यारीदामिनी को अंक में भर

ghoomte उन्मुकत नभ मेंवायु के म्रदु-मंद रथ पर,
अट्टहास-विलास से मुख-रित बनाते शून्य को भी

जन सुखी भी क्षुब्ध होतेभाग्य शुभ मेरा सिहाकर;
प्रणयिनी भुज-पाश से जोहै रहा चिरकाल वंचित,

यक्ष मुझको देख कैसेफिर न दुख में डूब जाता?
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

देखता जब यक्ष मुझकोशैल-श्रंगों पर विचरता,

एकटक हो सोचता कुछलोचनों में नीर भरता,
यक्षिणी को निज कुशल-संवाद मुझसे भेजने की

कामना से वह मुझे उठबार-बार प्रणाम करता
कनक विलय-विहीन कर सेफिर कुटज के फूल चुन कर

प्रीती से स्वागत-वचन कहभेंट मेरे प्रति चढा़ता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

पुष्करावर्तक घनों केवंश का मुझको बताकर,

कामरूप सुनाम दे, कहमेघपति का मान्य अनुचर
कंठ कातर यक्ष मुझसेप्रार्थना इस भांति करता-

'जा प्रिया के पास लेसंदेश मेरा,बंधु जलधर!
वास करती वह विरहिणीधनद की अलकापुरी में,

शंभु शिर-शोभित कलाधरज्योतिमय जिसको बनाता'
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

यक्ष पुनः प्रयाण के अनु-रूप कहता मार्ग सुखकर,

फिर बताता किस जगह पर,किस तरह का है नगर, घर,
किस दशा, किस रूप में हैप्रियतमा उसकी सलोनी,

किस तरह सूनी बितातीरात्रि, कैसे दीर्ध वासर,
क्या कहूँगा,क्या करूँगा,मैं पहुँचकर पास उसके;

किन्तु उत्तर के लिए कुछशब्द जिह्वा पर ना आता
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

मौन पाकर यक्ष मुझकोसोचकर यह धैर्य धरता,

सत्पुरुष की रीति है यहमौन रहकर कार्य करता,
देखकर उद्यत मुझेप्रस्थान के हित,
कर उठाकरवह मुझे आशीष देता-
'इष्ट देशों में विचरता,हे जलद, श्री व्रिध्दि कर तू

संग वर्षा-दामिनी के,हो न तुझको विरह दुख

जो आज मैं विधिवश उठाता!'
'मेघ' जिस जिस काल पढ़ता,मैं स्वयं बन मेघ जाता!

-हरिवंश राय बच्चन

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? -
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

-हरिवंश राय बच्चन

साथी, सब कुछ सहना होगा!

मानव पर जगती का शासन,
जगती पर संसृति का बंधन,
संसृति को भी और किसी के प्रतिबंधों में रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

हम क्या हैं जगती के सर में!
जगती क्या, संसृति सागर में!
एक प्रबल धारा में हमको लघु तिनके-सा बहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

आओ, अपनी लघुता जानें,
अपनी निर्बलता पहचानें,
जैसे जग रहता आया है उसी तरह से रहना होगा!
साथी, सब कुछ सहना होगा!

-हरिवंश राय बच्चन

था तुम्हें मैंने रुलाया!

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर -
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

- हरिवंश राय बच्चन

जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैंने देखा
मैं खड़ा हुआ हूँ इस दुनिया के मेले में,
हर एक यहाँ पर एक भुलाने में भुला
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में
कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौचक्का-सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जा?
फिर एक तरफ से आया ही तो धक्का-sa
मैंने भी बहना शुरू किया उस रेले में,
क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मेला जितना भड़कीला रंग-रंगीला था,
मानस के अन्दर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख़्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,
जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठण्ढे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;
अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊँ
क्या मान अकिंचन बिखराता पथ पर आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला ऐसा मुझको,
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,
यह थी तकदीरी बात मुझे गुण दोष न दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आँसू, वह मोती निकला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
मैं कितना ही भूलूँ, भटकूँ या भरमाऊँ,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पाँव पड़े ऊँचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,
मुझ पर विधि का आभार बहुत-सी बातों का।
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहाँ खड़ा था कल उस थल पर आज नहीं,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देती
केवल छूकर ही देश-काल की सीमाएँ
जग दे मुझपर फैसला उसे जैसा भाए
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

-Harivansh Rai Bachchan

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

‘यह अधिकार कहाँ से लाया!’
और न कुछ मैं कहने पाया -
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में -
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

-Harivansh Rai Bachchan

मंजिल न दे चराग न दे

मंजिल न दे चराग न दे होसला तो दे,

तिनके के का ही सही तू मगर आसरा तो दे.

मैंने ये कब कहा के मेरे हक मी हो जवाब,

लेकिन खामोश क्यों हे तूं कोई फैसला तो दे.

बरसों में तेरे नाम पर खाता रह फरेब,

मेरे खुदा कहाँ है तूं अपना पता तो दे.

बेशक मेरे नसीब पर रख अपना इख्तियार,

लेकिन मेरे नसीब मैं क्या है बता तो दे.

-Rana Sahri

Tuesday, January 27, 2009

जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा

बाहर के आंधी पानी से मन का तूफ़ान कहीं बढ़ कर

बाहर के सब आघातों से, मन का अवसान कहीं बढ़कर

फिर भी मेरे मरते मन ने, तुम तक उड़ने की गति चाही

तुमने अपनी लौ से मेरे सपनो कि चंचलता दाही

इस अनदेखी लौ ने मेरी बुझती पूजा मैं रूप गढा

जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा



मैंने चाहा तुम मैं लय हो साँसों के स्वर सा खो जाना

मैं प्रतिक्षण तुममे ही बीतू हो पूर्ण समर्पण का बाना

तुमने ना जाने क्या करके मुझको भंवरो मैं भरमाया

मैंने अगणित मझ्धारो मैं तुमको साकार खडे पाया

भयकारी लहरों मैं भी तो तुम तक आने का चाव चढा

जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा



मेरे मन को आधार यही यह सब कुछ तुम ही देते हो

दुःख मैं तन्मयता देकर सुख कि मदिरा हर लेते हो

मैंने सारे अभिमान तजे लेकिन न तुम्हारा गर्व

संचार तुम्हारी करुना का मेरे मन मैं ही नित्य नया

मैंने इतनी दूरी मैं भी तुम तक आने का स्वप्न गढा

जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा

आभास तुम्हारी महिमा का कर देता है पूजा मुश्किल

परिपूर्ण तुम्हारी वत्सलता करती मन कि निष्ठा मुश्किल

मैं सब कुछ तुममे ही देखु सब कुछ तुममे ही हो अनुभव

मेरा यह दुर्बल मन किन्तु कहाँ होने देता यह सुख संभव

जितनी तन कि धरती डूबी उतना तन का आकाश बढा

जितनी तुमने व्याकुलता दी उतना तुम पर विश्वास बढा





आप की याद आती रही रात भर,

चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर।


कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन,

कोई तस्वीर गाती रही रात भर।


जो न आया उसे कोई जंजीरे - दर,

हर सदा पर बुलाती रही रात भर।


एक उम्मीद से दिल बहलता रहा,

इक तमन्ना सताती रही रात भर।

- faiz